“रहता हूँ पास तेरे “

रहता हूँ तेरे पास कहीं
मैं छुप कर रातों में
कभी ढूंढ़ तो मुझको जानेजां
बिस्तर की उलझी सिलवट में
कभी पलट के देख सही
तकिये के गिलाफो को |
बेहोश न हो , तू होश में रह
मैं दूर नहीं हूँ पास तेरे
आता हु छुप के कमरें में
रोशनदान के पीछे से
फिर छू लेता हुँ गालोँ को
एक मस्त हवा के झोके से
रोशन करता हुँ रातों को
तेरे कमरों की दीवारो को
मैं हूँ चाँद का एक टुकड़ा
आता हुँ तेरे ख्वाबों में |
मुझे खुश कर देती है अंगड़ाई तेरी
मैं हुँ आशिक़ तेरे ख्यालों का ,
मुझे चोर ना समझना जानेजां
चप्पल ना दिखाना गुस्से से
मैं छुप जाऊंगा तेरी पलको मेँ
बेसुध नींद की तरह
फिर ढुंढोगी तो आऊंगा ना
हाथ कभी मेँ गुलहर के फूल की तरह
रातों को जागोगी , बेचैनी से भागोगी
बिस्तर बीमार होगा , उलझ के जंजाल होगा
आँखें नाखुश होंगी , लैब पे यह शिकायत होगी
उलझन मेँ दिल होगा , मन मेँ तलब सी होगी
मनाने को कोई ना होगा
तुम गम से बेसुध होगी
फिर आँख ज्यों तुम्हारी झपकेंगी
मैं मिलजाउंगा हौले से , तुमको उस अंधियारे मेँ
तुम सोचोगी मैं दूर गया
तुम्हे याद नहीं तुम भूल गई
मैं रहता हुँ जानेजां पास तेरे
छुप के रातों मेँ ||

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5 thoughts on ““रहता हूँ पास तेरे “

  1. Thanks for such a lovely poem! This reflects highest Upanishadic philosophy in such simple language.
    I would like to add in my own imperfect and inelegant language:

    Lonely I came, lonely I go
    Waited my family till I hit the skies
    Until I came of age and grew
    My money attracting a lot of flies
    But everyone doubtless flew
    Emaciated I am lying cold
    My family arguing on my gold
    Why again I call everything mine
    Nothing is mine,nor thine

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